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एक दशरथ मांझी भी हुए है इस दुनिया में जिन्होंने अपनी पत्नी की याद में अकेले ही एक कुल्हाड़ी और हथौड़े से, पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाया था पर आज इन पहाड़ो को ज़रुरत है एक ऐसे दीवाने आशिक़ की जो इनके लिए पूरी दूनिया के खिलाफ खड़ा होकर, इनके अस्तित्व की लड़ाई लड़ सके। यह उम्मीद करना अब इन पहाड़ो के लिए मुश्किल है कि कोई इंसान  इनकी रक्षा करने के लिए आगे आएगा, इनकी बुनियाद, इनके सम्मान के लिए लड़ेगा लेकिन पहाड़ ये नहीं जानते कि आज भी कोई ज़िंदा है जो इसकी मिटटी की खुशबू में पला बड़ा है और इसके पास लौटने के लिए मचल रहा है, कोई है जो इसके हर ज़ख्म को अपने हाथों से छूकर इसके दर्द का एहसास कर रहा है, जो इन पहाड़ो से जुड़ी हर याद को अपने सीने में कैद करके किसी बहुत बड़े उद्देश्य की तैयारी में दिन रात एक करके इन पहाड़ो के संघर्ष में अपना भी योगदान दे रहा है। वह आशिक़ तब तक हार नहीं मानेगा जब तक ये पहाड़ खुद सर उठाकर उसके हौसले, उसकी मोहब्बत को सलाम न करे और इंसानो की अदालत में उन्हें न्याय न मिले

अरावली

विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला, ‘अरावली ‘ भारत की पृष्ठभूमि पर खड़ी, यह अप्रसिद्ध पर्वत श्रृंखला मौत के बेहद नज़दीक है। किसी समय में अपने विशाल व्यक्तित्व के लिए विख्यात यह पर्वत श्रंखला इस वक़्त ज़िन्दगी की आखिरी सांसे गिन रही है।
अरावली के पहाड़ अपने आप में खास नहीं है, आज यह कद में दूसरे पहाड़ो के मुकाबले काफी छोटे है।यहाँ के पहाड़ हिमालय या कश्मीर के पहाड़ों जैसे सफ़ेद बर्फ की चादर तो दूर, प्रकृति के किसी अभिशाप से, वनस्पती के अभाव से भी पीड़ित है। क्योंकि लोग प्राकृतिक सौंदर्य को एक लेबल दे चुके है, समुद्र, रेगिस्तान जंगल और ज्वालामुखी और बर्फ़ीले पहाड़ो के अलावा प्रकृति को देखना, समझना और जानना पसंद नहीं करते है इसलिए अरावली के पहाड़ो की खुबसुरती से अक्सर अनजान रह जाते है।

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इन पहाड़ो की तन्हाइयों में आज भी 1 कहानी गूंजती है। वह कहानी जो इन बेकसूर, मासूम पहाड़ो की वेदना में छिपी है, जिसे हम इंसानो ने अनसुना और अनदेखा कर दिया, अपने स्वार्थ के लिए।
मानव सभ्यता के आने से कई करोड़ो साल पहले ही इन पहाड़ो का धरती से रिश्ता जुड़ चुका था , न जाने कितने घोर तूफानो को इन मज़बूत पहाड़ो ने सहा है। अनगिनत पशु पक्षियों ने इन पहाड़ो में जन्म लिया, इसे अपना आशियाना बनाया और अपनी पूरी ज़िन्दगी इसके साये में गुज़ार इसकी गोद में ही दम तोड़ दिया। इन पहाड़ो का वजूद मिटाने आये हम इंसानो की, इन पहाड़ो के सामने चींटी की भी औकाद नहीं होती अगर हमारे पास सोचने समझनेे और कुछ जानने के लिए दिमाग नहीं होता। शायद इन पहाड़ो का कसूर सिर्फ इतना ही था कि  विकास और प्रगति के पथ पर चल रहा एक समाज देश और एक सभ्यता इंसानों की होकर भी इंसानियत से वंचित रह गई।

अपनी काबिलियत और लगन के भरोसे आज इन पहाड़ो को अपने आगे झुकाने में हम कामयाब तो हो चुके है लेकिन उन पहाड़ो की नज़रों में शायद हम सिर्फ घमंड और स्वार्थ से भरे खूंखार मशीनी जानवर है जो बेवजह उनकी शांति और अमन के साथ खिलवाड़ करते है, अपने अहंकार में जीते है, यहाँ तक कि अपनी ही प्रजाति के दूसरे प्राणियों की परवाह नहीं करते जो इन पहाड़ो पर आश्रित है।

हमारे पूर्वजों ने इन पहाड़ो की हिफाज़त के लिए बहुतेरी लड़ाइयां लड़ी है, इन पहाड़ो पर बसे कुछ गांवो मे आज भी इन्हें देवताओ की तरह पूजने का चलन है लेकिन प्रकृति का क़त्ल सरेआम करने वालो की कमी भी तो नहीं इस दुनिया में। वो लोग इन पहाड़ो को, कीमती पत्थरो का अवैध खनन करने के लिए जो नुकसान पहुँचाते है उसका खामियाज़ा चुकाने की तैयारी अब हमें कर लेनी चाहिए।
ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज जैसी समस्याओं से आज इसी वजह से हमें सामना करना पड़ रहा है क्योंकि व्यापार और औद्योगिकरण ने हमे सीखा दिया है- प्रकृति की कीमत तय करके उसे बेचना, खरीदना और इस्तेमाल करके उसे अपने रास्ते से उखाड़ फ़ेंक देना।
इन पहाड़ो के इतिहास को किताबे पढ़कर नहीं जान सकते, उसे जानने के लिए ज़रूरी है इन उजड़े पहाड़ो के समीप होना, इनकी उदासी को अपनी आँखों से देखकर महसूस करना और सुनना इनकी ख़ामोशी की भुला दी गई दास्तान !

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एक दशरथ मांझी भी हुए है इस दुनिया में जिन्होंनो अपनी पत्नी की याद में अकेले ही एक कुल्हाड़ी और हथौड़े से, पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाया था पर आज इन पहाड़ो को ज़रुरत है एक ऐसे दीवाने आशिक़ की जो इनके लिए पूरी दूनिया के खिलाफ खड़ा होकर, इनके अस्तित्व की लड़ाई लड़ सके। यह उम्मीद करना अब इन पहाड़ो के लिए मुश्किल है कि कोई इंसान  इनकी रक्षा करने के लिए आगे आएगा, इनकी बुनियाद, इनके सम्मान के लिए लड़ेगा लेकिन पहाड़ ये नहीं जानते कि आज भी कोई ज़िंदा है जो इसकी मिटटी की खुशबू में पला बड़ा है और इसके पास लौटने के लिए मचल रहा है, कोई है जो इसके हर ज़ख्म को अपने हाथों से छूकर इसके दर्द का एहसास कर रहा है, जो इन पहाड़ो से जुड़ी हर याद को अपने सीने में कैद करके किसी बहुत बड़े उद्देश्य की तैयारी में दिन रात एक करके इन पहाड़ो के संघर्ष में अपना भी योगदान दे रहा है। वह आशिक़ तब तक हार नहीं मानेगा जब तक ये पहाड़ खुद सर उठाकर उसके हौसले, उसकी मोहब्बत को सलाम न करे और इंसानो की अदालत में उन्हें न्याय न मिले |

-Shrestha Chopra


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