Category: News & Updates

अरावली में जमीन घेरना और निर्माण करना हुआ वैध। केंद्रीय मंत्री ने की घोषणा।

बनाओ बनाओ… सब बनाओ… कोई नही तोड़ेगा।

कहते हुए कल एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मोदी जी के मंत्री श्री कृष्ण पाल गुर्जर ने खुश होकर पत्रकारों को आजादी दी और घोषणा की की अरावली में निर्माणों को कोई नही तोड़ेगा, सरकार का काम बनाने का है, तोड़ने का नही।

कुछ पत्रकारों ने जब केंद्रीय मंत्री जी से सीधा सवाल पूछा कि क्या हम भी बना सकते हैं अरावली में फार्म हाउस तो मंत्री जी ने बड़े गर्व से कहा कि बनाओ बनाओ, जमीन है तो बनाओ तुम भी।

मंत्री जी के साथ वार्तालाप का वीडियो पंजाब केसरी न्यूज़ चैनल ने सोशल मीडिया पर प्रकाशित किया है जिसको खूब फैलाया जा रहा है।

https://youtu.be/NNpJi8aIrak

जहां एक और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन सरकार के साथ मिलकर दिल्ली एनसीआर में पर्यावरण संरक्षण की बात कर रहे हैं, बजट बना रहे हैं वहां उसी सरकार के केंद्रीय मंत्री का बेतुका बयान पर्यावरण संरक्षण करने वाले सरकारी और गैर सरकारी संगठनों के मुँह पर तमाचा है।

क्या अरावली को बचाने भी कोई सरफिरा आशिक आएगा ?

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एक दशरथ मांझी भी हुए है इस दुनिया में जिन्होंने अपनी पत्नी की याद में अकेले ही एक कुल्हाड़ी और हथौड़े से, पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाया था पर आज इन पहाड़ो को ज़रुरत है एक ऐसे दीवाने आशिक़ की जो इनके लिए पूरी दूनिया के खिलाफ खड़ा होकर, इनके अस्तित्व की लड़ाई लड़ सके। यह उम्मीद करना अब इन पहाड़ो के लिए मुश्किल है कि कोई इंसान  इनकी रक्षा करने के लिए आगे आएगा, इनकी बुनियाद, इनके सम्मान के लिए लड़ेगा लेकिन पहाड़ ये नहीं जानते कि आज भी कोई ज़िंदा है जो इसकी मिटटी की खुशबू में पला बड़ा है और इसके पास लौटने के लिए मचल रहा है, कोई है जो इसके हर ज़ख्म को अपने हाथों से छूकर इसके दर्द का एहसास कर रहा है, जो इन पहाड़ो से जुड़ी हर याद को अपने सीने में कैद करके किसी बहुत बड़े उद्देश्य की तैयारी में दिन रात एक करके इन पहाड़ो के संघर्ष में अपना भी योगदान दे रहा है। वह आशिक़ तब तक हार नहीं मानेगा जब तक ये पहाड़ खुद सर उठाकर उसके हौसले, उसकी मोहब्बत को सलाम न करे और इंसानो की अदालत में उन्हें न्याय न मिले

अरावली

विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला, ‘अरावली ‘ भारत की पृष्ठभूमि पर खड़ी, यह अप्रसिद्ध पर्वत श्रृंखला मौत के बेहद नज़दीक है। किसी समय में अपने विशाल व्यक्तित्व के लिए विख्यात यह पर्वत श्रंखला इस वक़्त ज़िन्दगी की आखिरी सांसे गिन रही है।
अरावली के पहाड़ अपने आप में खास नहीं है, आज यह कद में दूसरे पहाड़ो के मुकाबले काफी छोटे है।यहाँ के पहाड़ हिमालय या कश्मीर के पहाड़ों जैसे सफ़ेद बर्फ की चादर तो दूर, प्रकृति के किसी अभिशाप से, वनस्पती के अभाव से भी पीड़ित है। क्योंकि लोग प्राकृतिक सौंदर्य को एक लेबल दे चुके है, समुद्र, रेगिस्तान जंगल और ज्वालामुखी और बर्फ़ीले पहाड़ो के अलावा प्रकृति को देखना, समझना और जानना पसंद नहीं करते है इसलिए अरावली के पहाड़ो की खुबसुरती से अक्सर अनजान रह जाते है।

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इन पहाड़ो की तन्हाइयों में आज भी 1 कहानी गूंजती है। वह कहानी जो इन बेकसूर, मासूम पहाड़ो की वेदना में छिपी है, जिसे हम इंसानो ने अनसुना और अनदेखा कर दिया, अपने स्वार्थ के लिए।
मानव सभ्यता के आने से कई करोड़ो साल पहले ही इन पहाड़ो का धरती से रिश्ता जुड़ चुका था , न जाने कितने घोर तूफानो को इन मज़बूत पहाड़ो ने सहा है। अनगिनत पशु पक्षियों ने इन पहाड़ो में जन्म लिया, इसे अपना आशियाना बनाया और अपनी पूरी ज़िन्दगी इसके साये में गुज़ार इसकी गोद में ही दम तोड़ दिया। इन पहाड़ो का वजूद मिटाने आये हम इंसानो की, इन पहाड़ो के सामने चींटी की भी औकाद नहीं होती अगर हमारे पास सोचने समझनेे और कुछ जानने के लिए दिमाग नहीं होता। शायद इन पहाड़ो का कसूर सिर्फ इतना ही था कि  विकास और प्रगति के पथ पर चल रहा एक समाज देश और एक सभ्यता इंसानों की होकर भी इंसानियत से वंचित रह गई।

अपनी काबिलियत और लगन के भरोसे आज इन पहाड़ो को अपने आगे झुकाने में हम कामयाब तो हो चुके है लेकिन उन पहाड़ो की नज़रों में शायद हम सिर्फ घमंड और स्वार्थ से भरे खूंखार मशीनी जानवर है जो बेवजह उनकी शांति और अमन के साथ खिलवाड़ करते है, अपने अहंकार में जीते है, यहाँ तक कि अपनी ही प्रजाति के दूसरे प्राणियों की परवाह नहीं करते जो इन पहाड़ो पर आश्रित है।

हमारे पूर्वजों ने इन पहाड़ो की हिफाज़त के लिए बहुतेरी लड़ाइयां लड़ी है, इन पहाड़ो पर बसे कुछ गांवो मे आज भी इन्हें देवताओ की तरह पूजने का चलन है लेकिन प्रकृति का क़त्ल सरेआम करने वालो की कमी भी तो नहीं इस दुनिया में। वो लोग इन पहाड़ो को, कीमती पत्थरो का अवैध खनन करने के लिए जो नुकसान पहुँचाते है उसका खामियाज़ा चुकाने की तैयारी अब हमें कर लेनी चाहिए।
ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज जैसी समस्याओं से आज इसी वजह से हमें सामना करना पड़ रहा है क्योंकि व्यापार और औद्योगिकरण ने हमे सीखा दिया है- प्रकृति की कीमत तय करके उसे बेचना, खरीदना और इस्तेमाल करके उसे अपने रास्ते से उखाड़ फ़ेंक देना।
इन पहाड़ो के इतिहास को किताबे पढ़कर नहीं जान सकते, उसे जानने के लिए ज़रूरी है इन उजड़े पहाड़ो के समीप होना, इनकी उदासी को अपनी आँखों से देखकर महसूस करना और सुनना इनकी ख़ामोशी की भुला दी गई दास्तान !

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एक दशरथ मांझी भी हुए है इस दुनिया में जिन्होंनो अपनी पत्नी की याद में अकेले ही एक कुल्हाड़ी और हथौड़े से, पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाया था पर आज इन पहाड़ो को ज़रुरत है एक ऐसे दीवाने आशिक़ की जो इनके लिए पूरी दूनिया के खिलाफ खड़ा होकर, इनके अस्तित्व की लड़ाई लड़ सके। यह उम्मीद करना अब इन पहाड़ो के लिए मुश्किल है कि कोई इंसान  इनकी रक्षा करने के लिए आगे आएगा, इनकी बुनियाद, इनके सम्मान के लिए लड़ेगा लेकिन पहाड़ ये नहीं जानते कि आज भी कोई ज़िंदा है जो इसकी मिटटी की खुशबू में पला बड़ा है और इसके पास लौटने के लिए मचल रहा है, कोई है जो इसके हर ज़ख्म को अपने हाथों से छूकर इसके दर्द का एहसास कर रहा है, जो इन पहाड़ो से जुड़ी हर याद को अपने सीने में कैद करके किसी बहुत बड़े उद्देश्य की तैयारी में दिन रात एक करके इन पहाड़ो के संघर्ष में अपना भी योगदान दे रहा है। वह आशिक़ तब तक हार नहीं मानेगा जब तक ये पहाड़ खुद सर उठाकर उसके हौसले, उसकी मोहब्बत को सलाम न करे और इंसानो की अदालत में उन्हें न्याय न मिले |

-Shrestha Chopra

Leopard killings in the Aravali

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Recently a leopard strayed into village Mandaawar in Gurgaon District in Aravali region,and was clubbed and lynched to death by the villagers after it mauled nine people including a policeman.

It was a sort of circus show for the villagers, an instance of gross neglect of duty by the wild life preservation and forest officials of the area.

Height of truth is that the forest officials had not even the tranquilizers to calm and sedate the panicked cat which had strayed into the forbidden territory of human animals.

This is not an isolated incident. There have been repeated instance of big cats straying into human habitation in last few years. That they are around is a welcome thing, they are being clubbed, lynched is very tragic. There are even reports of poaching and hunting of these hapless animals and use of poisoned goats being used as baits for these big cats have been reported by media.

One big cat was run over by vehicle on highway in Sarahan village a few months earlier. One reason for frequent sightings of these big cats in Aravalis region is complete ban on mining of minor minerals in Gurgaon and Faridabad districts and increase of green cover in the area through efforts of forest department and some NGOs.

However,the common adage “Won’t let them live, won’t let them perish”applies here. Though the ban on mining activities and increased forest cover has been conducive for growth of these big cat,lack of proper ecological circuit in the area forces them to stray into human habitation be it lack of proper water bodies,intervening human dwellings and inert attitude of forest and wildlife officials towards these hapless animals.

Coming to bare statistics,hardly 3 to 4% of total area in Haryana state falls under forest cover , predominantly in Aravalis region in Faridabad, Gurugram, Riwari, Palwal and Narnaul districts. Technically the same is not declared “forest area” and demarcated as “Gair Mumkim pahad ” in revenue records, land not fit for cultivation and revenue generation and totally at the mercy of rapacious builders and crafty urban planners, though at the great peril to huge urban conglomerates coming around in this area.

Dire need is that the State government,in association with the Central government, in the interest of healthy ecological environment for the people residing here, and flora and fauna of this area, should adopt a stiff and pragmatic approach and declare the hilly areas in this region as ‘No Residential zone’ and take effective steps for declaring the areas as Protected Area under Chapter.4 of Wild life Protection Act 1972 .

The State government has power u.s.18 of Wild Life Protection Act 1972 to constitute an area other than an area comprised within any reserve forest or the territorial waters as a sanctuary if it considers that such area is of adequate ecological, fauna, floral, geomorphological, natural or zoological significance for the purpose of protecting, propagating or developing wild life or its environment.

The basic principle is that if the wild life around is thriving, it is a sure shot test for healthy and pollution free environment. Let there be a message to the wild life around that we care for you. Let our national capital boast of a wild life sanctuary in neighborhood.

We, the ‘Save Aravali’ team make fervent appeal to the authorities to respond to this clarion call and take timely and visionary step for guaranteeing a healthy, pollution free, ecologically balanced environment for the people around and flora and fauna of this area.

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Kuldeep Malik
Retired Excise and Taxation Commissioner
Advocate-Supreme Court
Activist-Save Aravali

ये है सूरज कुंड का असली चेहरा.

चलो जी आज आपको सैर कराते हैं विदेशों तक मशहूर, फरीदाबाद की शान सूरजकुंड की।

जी हाँ, वही सूरजकुण्ड जहाँ मेला लगता है। पूरी दुनिया आती है। पूरे पंद्रह दिन चलता है। बड़ी बड़ी पार्टियां होती हैं यहाँ। विश्व स्तर के होटल हैं यहाँ। मोदी जी की पसंदीदा जगहों में से एक है ये जगह। देश का लगभग हर नेता आया होगा यहाँ. बस पार्टी करके निकल लेते हैं.

सब सूरजकुंड आते हैं। राजा अनंगपाल के बनाये इस ऐतिहासिक स्मारक को देखने।

परन्तु ये है असली सूरजकुंड. 15 अक्टूबर 2016 की तस्वीर –

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खुजली वाले कुत्ते, जिसको बाकी कुत्तों ने मारा पीटा हो, की सी हालत है असली सूरजकुंड की. और इसके जिम्मेदार हैं – नेता और अफसर. खूब लूटा है बेचारे सूरजकुंड को. अभी भी इसी के नाम पर पैसे कमा रहे हैं.  शायद आप ये भी जानना चाहेंगे की ये हुआ कैसे?
अगर किसी नेता या अफसर से इसके बारे में बात की जाए तो उनका एक ही जवाब होगा- बारिश ही कहाँ होती हैं जी आज कल. कहाँ से भरे सूरजकुंड?

लेकिन सच्चाई कुछ और ही है. चलो हम ही बता देते हैं-
– यहाँ के आस पास की जमीन (सरकारी जमीन भी) नेताओं और अफसरों ने मिल बाँट कर बेच दी है.
– सूरज कुंड के कैचमेंट एरिया (जहां से इसमें पानी आता है) में कच्ची कलोनियाँ बसा दी गयी हैं. नेता लोग उन कलोनियों में वोट कमाने के लिए आये दिन नारियल फोड़ने जाते रह्ते हैं.
– इसके चारों और आस पास के नालों को इकसार करवा कर बड़े बड़े लोगों ने फार्म हाउस बना दिए हैं. मजेदार बात ये है की कागजों और सरकारी दस्तावेजों में लगभग पूरा इलाका पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट 1900 की सेक्शन 4 एवं 5 के तहत सुरक्षित है और यहाँ आना जाना तक मना है.
– बड़े बड़े नेताओं ने इसके चारों तरफ ट्यूबवैल लगा दिए हैं जिनसे पानी निकाल कर कच्ची कलोनियों में बेचा जा रहा है, बोतलों में भर भर के पूरे देश में सपलायी की जा रही है.

आपको एक अहम् बात और बता देते हैं की इस बार दिल्ली NCR में उम्मीद से ज्यादा बारिश हुयी है लेकिन सूरजकुंड में केवल यही पानी भरा है. जो आपको इस तस्वीर में दिख रहा है. ज्यादा ना कहा जाए तो- अगर यहाँ बादल भी फट जाए तो भी इतना ही पानी भरेगा इस में. क्योंकि नेताओं और अफसरों ने यहाँ जो विज्ञान लगाया है वो ये कह्ता है की जितना भी पानी बरसेगा वो ऑटोमेटिकली रुपयों में कन्वर्ट होकर इनकी जेबों में आ जायेगा.

हँसेंगे आप. कुछ को दुःख भी होगा. कुछ कहेंगे की सेव अरावली नेगेटीव चीजों को प्रेजेंट कर रही है. परन्तु हमें इससे कोई दुःख नहीं होगा क्योंकि हमारी इस पोस्ट से उन्ही लोगों को दुःख होगा जो इसके नाम पर नौकरियाँ कर रहे हैं, जमीने बेच रहे हैं, बिल्डिंगें बेच रहे हैं, होटल चला रहे हैं, नेतागीरी कर रहे हैं.

NCRPB की वजह से हुआ है दिल्ली का ये हाल

NCR Planning Board बनाने का एक मुख्य मकसद था दिल्ली के मुख्य बजारों, कम्पनियों और सरकारी महकमो का विकेंद्रियकरण करना।

मतलब, जो माल कनौट प्लेस में मिलता है वो दिल्ली के NCR क्षेत्र में (सोनीपत, गुडगाँव, पलवल, गाजियाबाद) में भी उसी दाम पर उपलब्ध हो, कंपनियोँ में काम करने वाले दिल्ली ना भागें, सरकारी कामकाज के लिए हर बार दिल्ली ही ना भागा जाए

NCR Planning Board बनाने का एक मुख्य मकसद था दिल्ली के मुख्य बजारों, कम्पनियों और सरकारी महकमो का विकेंद्रियकरण करना।

मतलब, जो माल कनौट प्लेस में मिलता है वो दिल्ली के NCR क्षेत्र में (सोनीपत, गुडगाँव, पलवल, गाजियाबाद) में भी उसी दाम पर उपलब्ध हो, कंपनियोँ में काम करने वाले दिल्ली ना भागें, सरकारी कामकाज के लिए हर बार दिल्ली ही ना भागा जाए

जिससे की ~
1. NCR की भीड़ दिल्ली में ना आये.
2. आस पास के रहने वालों को बराबर काम व नौकरियों के अवसर मिलें
3. दिल्ली में ट्रैफिक ना बढे
4. बाकी राज्यों के लोग दिल्ली माइग्रेट ना हों
5. दिल्ली का प्रदूषण स्तर ना बढे

ये पढ़ें- https://goo.gl/sL7CpG

लेकिन NCR Planning Board ने कुछ और ही बना दिया. आज हालत ये है की दिल्ली से सौ सौ किलोमीटर दूर रहने वाले लोग सुबह उठते हैं और ट्रेनों, बसों, कारों में भरकर दिल्ली की और भागते है. शाम को फिर वापिस अपने अपने घरों की और भागते हैं. जो डेली आना जाना नहीं कर पाते, वो यहीं बस जाते हैं. आज NCR Planning Board की गलती ने क्या हाल कर दिया है दिल्ली का.चंद अफसरों की गलतियों के कारण-

1 पूरे देश की GDP पर असर आ रहा है.
2 छोटे शहरों से बहुत तेजी से लोग पलायन कर रहे हैं जिससे की पूरी अर्थव्यव्स्था हिल रही है
3 सांस लेने तक की जगह नहीं मिलती दिल्ली में.
4 दिल्ली के लोगों की औसत आयु तेजी से घट रही है.
5 यहाँ के जन जीवन में बहुत ही ज्यादा भाग दौड पैदा हुयी है.लोगों के जीवन से सुख चैन लगभग गायब ही हो चुका है.
6 दिल्ली और NCR का प्रदूषण स्तर लगातार बढ़ता ही जा रहा है.
7 बेकार के खर्चे बढे हैं.
8 जिन शहरों की तरक्की के लिए NCR Planning Board बनाया गया था, वो उलटे डूबते जा रहे हैं.

मुसीबत ये है की कोई भी सरकार इस और ध्यान नहीं दे रही है बल्की मेट्रो को फैला कर असल में इस गलती को और बड़ा करते जा रहे हैं.  इस गलती को NCR Planning Board को मानना पडेगा और NCR का विकेंद्रियकरण करना ही पडेगा.

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Bad news for Lakarpur Khori encroachers

It must be a bad news for encroachers of Lakarpur Khori village of Faridabad. In the papers ,the land is a property of Faridabad municipality and is a protected forest under section 4 and 5 of Punjab Land Preservation Act (PLPA) 1900 but in actual, no forest is left, no waterbodies are left and a slum has been developed by some local leaders.

 

“I have been writing to the authorities but no action has been taken so far. Not just this, the authorities are trying to demotivate me and stop me following this as this might stop their regular income. But this may not be a game for long time for the encroachers and the engaged government officers ,” Jitender Bhadana, Environment Activist at Save Aravali says.

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“They have cut entire forest, have filled all the water bodies, destroyed the jungle. They sell illegal electricity, illegal water, illegal land to the buyers and are mobilizing slum class from across India to get cheap homes here just to ensure votes. See what shape they have given to the precious forest, the lungs, the oxygen factory of Delhi NCR”, he added.

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25.6.2016 Khori

 

Lakadpur

Reply for MCF on CM window complaint-

MCF Khori

Recently, he lodged an application to the CM window also but the reply given by the MCF was not just unsatisfactory but discouraging.

Activist Jitender Bhadana blames MCF for promoting slum here and not taking any legal action. Save Aravali lawyers are working to file a case in NGT on this very soon.

Connecting the unconnected

World Environment Day celebration 2015

Only 2 out of 10 people have Internet connection but they are affecting governance and policy making in our country in disproportionate ways.

Save Aravali is doing good at social media but what should be our strategy to connect with those remaining 8 in Faridabad who are not active on social media?

Creating environment awareness among RWAs and giving presentation at neighborhood parks can be one of the options. What are the other options?

Public mobilization is great for environment literacy as well as our other domains of action. Today we are facing a serious challenge to connect with local leaders for our Seminar on 25 September. Now we have two options either to regret or take this opportunity to connect with the masses and their local leaders.

Please give your suggestions about what should be our strategy and what resources do we need to fulfill them? Please share your views.

अरावली बायोडायवर्सिटी पार्क में विकसित हुईं बोगनविलिया पौधे की 28 प्रजातियां

दक्षिणदिल्ली के अरावली बायोडायवर्सिटी पार्क में बोगनविलिया की 28 प्रजातियों देखीं जा सकतीं हैं। यहां बोगनविलेरियम का डीडीए उपाध्यक्ष अरुण गोयल ने सोमवार को उद्घाटन किया।

अरावली की पहाड़ी पर वसंत कुंज स्थित लगभग 700 एकड़ क्षेत्र में फैले अरावली बायोडायवर्सिटी पार्क में अनेक खूबसूरत प्राकृतिक दृश्य आप देख सकते हैं। यहां पर अरावली की पहाड़ी पर पाए जाने वाले देसी पौधे, पेड़, औषधीय पौधे, बटरफ्लाई पार्क, नेचर इंंटरप्रिटेशन सेंटर है। मेनिक्योर्ड रिक्रिएशन गार्डन में 30 तरह की बोगनविलिया फूलों की प्रजाति विकसित की गई हैं। यहां चेरी ब्लॉसम, लैंसबैंस ब्यूटी, रोजा डिलाइट, सुब्रा, मेरी पाल्मर स्पेशल, विशाखा, महारा रोजविले सहित 28 प्रजातियां विकसित हैं। इसके अलावा गुलाब की 28 हाइब्रिड प्रजाति (अब्राहम लिंकन, इको, ब्लू मून, एफिल टॉवर, आइसबर्ग, सोमर, कश्मीर, सुपरस्टार, जेम्ब्रा इत्यादि) के अलावा अनेक तरह के देसी पौधे और सजावटी पौधे विकसित किए गए हैं।

शहरीकरण की विसंगतियां

जहां महानगरों में दड़बेनुमा मकानों में भीड़ बढ़ती जा रही है वहीं गांवों-कस्बों के लाखों घरों में ताले जड़े हैं। बढ़ते शहरीकारण का परिणाम देश के असंतुलित विकास के रूप में सामने आ रहा है। बढ़ते शहरीकरण के साथ तीसरी समस्या ग्रामीण इलाकों में कार्यशील आबादी में आ रही कमी और खेती-बाड़ी की उपेक्षा के रूप में पैदा हुई है।

राजनीतिः शहरीकरण की विसंगतियां

शहरीकरण को लेकर सरकार का नजरिया यह है कि इस पर सियापा करने के बजाय इसे मौके के रूप में देखा जाना चाहिए। उसके मुताबिक शहरों में गरीबी दूर करने की ताकत होती है और हमें इस ताकत को और आगे बढ़ाना चाहिए ताकि आर्थिक समृद्धि का स्वत: प्रसार हो।
सुख-सुविधाओं की मौजूदगी के चलते शहर सदा से मनुष्य के आकर्षण के केंद्र रहे हैं। आज की तारीख में तो ये विकास के इंजन बन चुके हैं। दरअसल, ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरों में लोगों की ज्यादा आमदनी और वस्तुओं का अधिक उपभोग जहां ‘पुल फैक्टर’ का काम करता है वहीं गांवों की गरीबी-बेरोजगारी ‘पुश फैक्टर’ का। ये दोनों मिल कर शहरों में भीड़ बढ़ा रहे हैं। चूंकि शहरों में लोगों की आमदनी ज्यादा होती है इसलिए वस्तुओं और सेवाओं की खपत बढ़ती है जिसका नतीजा अंतत: कंपनियों की अधिक कमाई और देश के जीडीपी की तेज रफ्तार के रूप में सामने आता है। लेकिन शहरीकरण को विकास का पर्याय मानने से पहले शहरी संरचना और और उसकी वैश्विक प्रवृत्ति का संक्षिप्त परिचय अपेक्षित है।
शहर मानव की सबसे जटिल संरचनाओं में से एक है। यह एक ऐसी यात्रा है जिसका कोई अंत नहीं है। शहर में व्यवस्था और अव्यवस्था साथ-साथ चलते हैं। आमतौर पर शहरों को आर्थिक विकास का इंजन माना जाता है क्योंकि शहरीकरण अनिवार्य रूप से औद्योगीकरण से जुड़ा है। आज दुनिया की आधी आबादी शहरों में रह रही है और अनुमान है कि 2050 तक यह अनुपात बढ़ कर सत्तर फीसद हो जाएगा। उस समय विकसित देशों की चौदह फीसद और विकासशील देशों की मात्र तैंतीस फीसद आबादी शहरी सीमा से बाहर होगी।
शहरीकरण की रफ्तार विकासशील देशों में सबसे तेज है। यहां हर महीने पचास लाख लोग शहरों में आ जाते हैं और विश्व में शहरीकरण में वृद्धि के पंचानबे प्रतिशत हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं। शहरीकरण के संदर्भ में एक नई प्रवृत्ति यह उभरी है कि बड़े-बड़े महानगर आपस में मिल कर बृहत महानगर या ‘मेगा रीजन’ बना रहे हैं। उदाहरण के लिए, भारत में दिल्ली-गाजियाबाद-नोएडा-गुड़गांव-फरीदाबाद, जापान में नगोया-ओसाका-क्योटो और चीन में हांगकांग-शेनजेन-ग्वांझाऊ। ये वृहत महानगर देशों की तुलना में संपदा की चालक-शक्ति बन कर उभरे हैं। उदाहरण के लिए, चोटी के पच्चीस शहरों के खाते में दुनिया की आधी संपत्ति आती है। भारत और चीन के पांच सबसे बड़े महानगर इन देशों की आधी संपदा रखते हैं।
देखा जाए तो शहरीकरण कई कारकों के सम्मिलित प्रभाव का परिणाम है, जैसे भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या वृद्धि, ग्रामीण-शहरी प्रवास, राष्ट्रीय नीतियां, आधारभूत ढांचा, राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां। 1990 के दशक में विकासशील देशों में शहर ढाई प्रतिशत वार्षिक की गति से बढ़ रहे थे, लेकिन इसके बाद उदारीकरण, भूमंडलीकरण ने विकासशील देशों में शहरीकरण को पंख लगा दिए। विशेषज्ञों के मुताबिक विकासशील देशों में शहरीकरण की गति तभी धीमी पड़ेगी जब अफ्रीका व एशिया के ग्रामीण बहुल क्षेत्र शहरी केंद्रों में बदल जाएंगे। 2050 तक विकासशील देशों की शहरी जनसंख्या 5.3 अरब हो जाएगी, जिसमें अकेले एशिया की भागीदारी 63 प्रतिशत या 3.3 अरब की रहेगी। 1.2 अरब लोगों के साथ अफ्रीका दुनिया की एक-चौथाई शहरी जनसंख्या का घर होगा।
इसे एक विरोधाभास ही कहेंगे कि विकासशील देशों के विपरीत विकसित देशों की शहरी जनसंख्या में बढ़ोतरी की रफ्तार थमती जा रही है। उदाहरण के लिए, 2005 में इन देशों की शहरी आबादी नब्बे करोड़ थी, जिसके 2050 तक 1.1 अरब पहुंचने की संभावना है। इन क्षेत्रों के कई शहरों में कम प्राकृतिक वृद्धि और प्रजनन क्षमता में ह्रास के चलते कुल जनसंख्या में कमी आएगी। विकासशील और विकसित देशों के शहरीकरण में एक मूलभूत अंतर यह है कि जहां विकसित देशों में उद्योग व सेवा क्षेत्र के विस्तार और व्यापक सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों के कारण शहरी क्षेत्र बेरोजगारी व झुग्गी-झोपड़ियों से मुक्त रहे, वहीं विकासशील देशों में स्थिति इसके विपरीत है।
विकसित देश ऊंची उत्पादकता, संसाधनों की तुलना में कम आबादी, औद्योगीकरण, मशीनीकृत खेती आदि के चलते शहरों में बसी आबादी को रोजी-रोटी मुहैया कराने में सफल हुए, लेकिन विकासशील देशों में ऐसी स्थिति नहीं है। इन देशों में उत्पादक जनसंख्या के प्रवास से गांवों में बुजुर्गों व महिलाओं की संख्या बढ़ी, जिससे कृषि-कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। यही कारण है कि खाद्यान्न पैदा करने वाले परिवार अब खरीद कर खा रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि विकासशील देशों के अरबों शहरी लोगों की क्षुधापूर्ति कैसे होगी? यह दुखद है कि हमारे नीति नियंता इस सवाल से कन्नी काट रहे हैं। हमें बहुत जल्द इस अनदेखी की कीमत चुकानी होगी। शहरीकरण का यह अर्थ नहीं है कि खाद्य सुरक्षा के तकाजे को ही किनारे कर दिया जाए। लेकिन धीरे-धीरे यही हो रहा है।
भारतीय संदर्भ में शहरीकरण और विकास को देखें तो वे एक दूसरे के पर्याय नजर आते हैं। आंकड़ों के मुताबिक भारत के सौ सबसे बड़े शहरों में देश की महज सोलह फीसद आबादी निवास करती है, लेकिन राष्ट्रीय आय में इन शहरों का हिस्सा तैंतालीस फीसद है। इसीलिए कई विशेषज्ञ देश में शहरीकरण को रफ्तार देने की वकालत करते रहते हैं। वे चीन का हवाला देते हैं जहां की आधी आबादी शहरों में रहती है, जबकि भारत में यह अनुपात महज एक-तिहाई है। उनका तर्क है कि यदि भारत को मांग आधारित विकास दर को बढ़ावा देना है तो उसे तेज शहरीकरण की नीति अपनानी चाहिए। भले ही शहरों को विकास का ‘ड्राइवर’ माना जाता हो लेकिन शहरीकरण के स्तर की दृष्टि से भारतीय शहर नकारात्मक तस्वीर पेश करते हैं।
बढ़ती जनसंख्या व घटती सुविधाओं के कारण शहरों की पहचान समस्या-स्थलों के रूप में होने लगी है। बिजली, पानी, सीवर, सड़क और परिवहन प्रणाली के अभाव में सामाजिक असंतोष पनप रहा है। भारतीय शहरों में रहने वाली तीस फीसद आबादी को नगर निगम का पानी नहीं मिलता, इकहत्तर फीसद लोग जहां-तहां कूड़ा-कचरा फेंक देते हैं तथा पचास से सत्तर फीसद मामलों में जल-मल निकास की कोई व्यवस्था नहीं है। शहरीकरण के साथ असमानता, बेरोजगारी, मानव तस्करी, वेश्यावृत्ति तथा नशीली दवाओं के धंधे फलने-फूलने से कानून व्यवस्था को खुली चुनौती मिल रही है। बढ़ती भीड़ ने भारतीय शहरों में रिहाइशी इलाकों की कीमतों में अपूर्व वृद्धि की है। चूंकि शहरों में बढ़ती आबादी को खपाने की क्षमता खत्म हो चुकी है, इसलिए अब ये आसपास के ग्रामीण इलाकों को निगलते जा रहे हैं।

बढ़ते शहरीकरण का सबसे पीड़ादायी पहलू यह है कि जहां एक ओर महानगरों में दड़बेनुमा मकानों में भीड़ बढ़ती जा रही है वहीं दूसरी ओर गांवों-कस्बों के लाखों घरों में ताले जड़े हैं। फिर रोजगार, आय आदि के बेहतर अवसरों के महानगरों तक सिमट जाने और बढ़ते शहरीकरण का परिणाम देश के असंतुलित विकास के रूप में सामने आ रहा है। शहरीकरण के साथ तीसरी समस्या ग्रामीण इलाकों में कार्यशील आबादी में आ रही कमी और खेती-बाड़ी की उपेक्षा के रूप में पैदा हुई है। भारत पनामा, सिंगापुर जैसा कोई छोटा-मोटा देश तो है नहीं, जो अपनी सवा सौ करोड़ आबादी को खाद्यान्न आयात करके खिला सके। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि छोटे शहरों-कस्बों के विकास पर ध्यान देते हुए शहरों को ग्रामीण इलाकों से जोड़ दिया जाए। यह कार्य टिकाऊ, सस्ती व भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था कर सकती है। इससे न सिर्फ महानगरों में भीड़भाड़ कम होगी बल्कि शहरों से निकली आमदनी के गांवों में पहुंचने से देश का समावेशी विकास भी होगा।
विश्व बैंक ने भी अपने आकलन में माना है कि लोगों के ग्रामीण इलाकों से शहरी इलाकों में आने के लिए यातायात व्यवस्था जितनी सुगम होगी अर्थव्यवस्था को उतना ही फायदा होगा। दरअसल, परिवहन व्यवस्था के सस्ती होने से न सिर्फ लोगों के बीच व्यापार में बढ़ोतरी होती है बल्कि कारोबार की लागत में भी अच्छी-खासी कमी आती है। उदाहरण के लिए, मुंबई की लोकल और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की ईएमयू हर रोज लाखों लोगों को सस्ते आवागमन की सुविधा मुहैया करा कर महानगरों की भीड़ कम करने में उल्लेखनीय भूमिका निभा रही हैं। अगर ये लोग मुंबई व दिल्ली में स्थायी रूप से बस जाते तो हजारों गांवों, कस्बों व छोटे शहरों का समावेशी विकास न होता। लेकिन आवागमन की सस्ती सुविधा दिल्ली-मुंबई तक सिमटी है। इसी को देखते हुए विश्व बैंक ने कहा है कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था के कायाकल्प के लिए शहरीकरण से मिले अवसरों को बेहतर तरीके से नहीं भुना पाया है।
इसी का नतीजा है कि शहरीकरण जहां पश्चिमी देशों में विकास का इंजन साबित हुआ वहीं भारत में आवासीय तंगी, भीड़-भाड़, बुनियादी सेवाओं की कमी व पर्यावरणीय समस्याओं की भेंट चढ़ गया। इसका कारण है कि यहां बढ़ते जनदबाव के अनुरूप बुनियादी सुविधाओं, अवसंरचना, आवास आदि के विकास पर ध्यान नहीं दिया गया। इसीलिए विश्व बैंक ने सुझाव दिया है कि शहरों को संचालित और वित्त-पोषित करने के तौर-तरीकों में नीतिगत और संस्थागत स्तर पर सुधार किया जाए। इससे शहरीकरण के लाभदायक नतीजे सामने आएंगे।
स्पष्ट है कि भारत शहरीकरण के मौकों को तभी भुना पाएगा जब वह बढ़ते जनदबाव के अनुरूप बुनियादी सुविधाओं, अवसंरचना, आवास आदि के विकास पर ध्यान दे। स्मार्ट सिटी मिशन इसी दिशा में उठाया गया एक ठोस कदम है। लेकिन इसके साथ-साथ टिकाऊ, सस्ती व भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन-व्यवस्था पर भी ध्यान देना होगा ताकि शहरीकरण से निकली समृद्धि गांव की पगडंडी तक पहुंच सके।

CGWA confirms groundwater contamination in the Aravallis

Central Ground Water Authority (CGWA) in a report submitted to the National Green Tribunal (NGT) has confirmed that leachate from defunct Bandhwari municipal waste treatment plant is flowing into natural water recharge zones, thus, polluting the ground water in Aravallis.

Responding to the petition, the report stated that, “The averments under para 1 to 6 are matter of record and need no comment.” Also, it said, “The municipal bodies are being made parties to the matter. They will explain their stand to this Hon’ble Tribunal.”

The move comes after the green court instructed the CGWA to prepare a report after a city-based environmentalist filed a petition alleging that leachate from Bandhwari municipal waste treatment plant is flowing into natural water recharge zones and polluting the ground water.

HT had first reported how groundwater of south Delhi, Gurgaon and Faridabad may be at risk of fast getting polluted by leachate from Bandhwari waste treatment plant flowing into the Aravalli forest, polluting the aquifers around.

When the court of Justice Swatanter Kumar on Tuesday asked the state government to respond to the report, the government representative asked for more time to study the CGWA report before replying.

The next hearing is scheduled for May 17.

Though the CGWA submitted its report to the court, there was no one to represent the authority. It also requested the court to exempt the CGWA from appearing for the hearing.

The petition states in Para 1-6 that the Municipal Corporation of Gurgaon and the Municipal Corporation of Faridabad are disposing of waste in the open, in an ecologically fragile, forested area of the Aravallis, which is polluting the groundwater and the forest area. It is also posing a serious health and life hazard to people in neighbouring cities of Delhi, Gurgaon and Faridabad by virtue of being at a higher elevation along the natural water drainage and groundwater recharge area. This destruction and dumping of waste is also destroying the wildlife in the area.

“The report substantiates our submission of the critical importance of the area in question as a vital water re-charge and conservation zone for Gurgaon, Faridabad and New Delhi,” said Vivek Kamboj, the petitioner.

However, it was also pointed out that, “The CGWA’s submission under para 8 are related to dumping of construction and industrial waste on the stretch of Delhi-Gurgaon and Delhi-Faridabad. It is submitted that the municipal solid waste management falls under the purview of the local municipal bodies as per the constitutional provisions.”

“We are surprised that while being aware of the “constitutional provisions” of the municipal authorities, the Central Groundwater Authority pretends to be ignorant of its own constitutional provisions and obligations. Does not dumping of construction, industrial, bio medical waste and toxic formation of leachate (in and around Bandhwari) contaminate groundwater and render the soil’s water absorption and percolation/re-charge capability useless?,” said Amit Chaudhery, another petitioner.

The petitioners also pointed that in the critical aspect of a water deficit Gurgaon, the CGWA should have been more proactive in monitoring, arresting, and preventing erosion and contamination of critical water tables.

The petition states that various laws have been violated by the government agencies. These include Municipal Solid Waste (Management and Handling) Rules (2000), Plastic Waste (Management and Handling) Rules (2011), Bio-Medical Waste Handling Rules (1998), Water (Prevention and Control of Pollution) Act 1974, and the Forest Act (2006).